एजेंसी/नैनीताल। उत्तराखंड के सरोवर नगरी नैनीताल में शत्रु संपत्ति पर काबिज सैकड़ों अतिक्रमणकारियों को उच्च न्यायालय से जबर्दस्त झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया है और याचिका को खारिज कर दिया है। अतिक्रमणकारियों को अब उच्चतम न्यायालय का सहारा है। मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की युगलपीठ में शुक्रवार को मोहम्मद अली समेत कुल नौ अतिक्रमणकारियों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से नैनीताल के उपजिलाधिकारी राहुल साह की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी गयी थी जिसमें सभी 134 अतिक्रमणकारी परिवारों को शत्रु संपत्ति खाली करने को कहा गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि एसडीएम की ओर से जो कार्यवाही की जा रही है वह अवैध है। एसडीएफ सक्षम प्राधिकारी नहीं है। शत्रु संपत्ति का उप अभिरक्षक (डिप्टी कस्टोडियन) जिलाधिकारी होता है और जिलाधिकारी को ही भूमि खाली कराने का अधिकार है। एसडीएम की ओर से जो नोटिस जारी किया गया है, वह गैरकानूनी है। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि प्रशासन उन्हें प्रशासनिक आदेश के बल पर नहीं हटा सकता है। प्रशासन की ओर से सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1971 (द पब्लिक प्रिमिसेस एक्ट, 1971) के तहत कार्यवाही की जानी चाहिए थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि शत्रु संपत्ति नियमावली, 2015 में कस्टोडियन को ही हटाने का अधिकार है। प्रशासन उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं कर सकता है।
दूसरी ओर सरकार की ओर से महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर अदालत में पेश हुए और उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि अतिक्रमणकारियों की ओर से जो दलीलें पेश की गयी हैं वह गलत हैं। सरकार की ओर से वर्ष 2010 में राजा महमूदाबाद से इस भूमि पर से कब्जा ले लिया गया था और अब भूमि को खाली कराने के लिये विधिवत प्रक्रिया अपनायी जा रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह शत्रु संपत्ति है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में पूर्व योजित जनहित याचिका में यह पहले ही प्रमाणित हो चुका है और याचिकाकर्ता इस भूमि पर अवैध रूप से काबिज हैं। अंत में अदालत ने याचिकाकर्ताओं की मांगों को अस्वीकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अतिक्रमणकारियों की पुनर्वास की मांग को भी अस्वीकार कर दिया। अदालत ने हालांकि, कहा कि अदालत अतिक्रमणकारियों को कुछ दिन की मोहलत दे सकती है लेकिन उन्हें बदले में अतिक्रमण हटाने के संबंध में अदालत में अंडर टेकिंग देनी पड़ेगी लेकिन पता चला कि किसी की ओर से भी शाम तक अंडर टेकिंग नहीं दी गयी। सूत्रों से यह भी पता चला है कि अतिक्रमणकारी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटायेंगे। दिल्ली में इसके लिये पहले से तैयारी है।







