- उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में ‘प्रेमचंद प्रसंग’ संगोष्ठी में वक्ताओं ने रेखांकित किया प्रेमचंद का यथार्थवाद, भारतीयता और समन्वयी दृष्टिकोण
हल्द्वानी। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएं विभाग द्वारा प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित ‘प्रेमचंद प्रसंग’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने मुंशी प्रेमचंद को भारतीय समाज की चेतना का लेखक बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने प्रेमचंद को भारतीयता और लोकतांत्रिक मूल्यों का रचनाकार करार देते हुए कहा कि प्रेमचंद हमारे जीवन के इतने समीप हैं कि वे कभी पुराने नहीं होते। यह हमारे समाज की विडंबना है कि हम आज भी उन्हें प्रासंगिक कहते हैं, जबकि उनकी रचनाएं आज भी हमारी संवेदना और यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। प्रो. लोहनी ने कहा कि प्रेमचंद की वैश्विक प्रतिष्ठा उनकी रचनात्मक ईमानदारी और मूल्यबोध के कारण है। उन्होंने न केवल स्वतंत्र समाज का स्वप्न देखा, बल्कि अपनी कहानियों और उपन्यासों में उसकी ठोस आधारभूमि भी रची। वे एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें हर वैचारिक धाराओं ने अपने लिए जरूरी समझा है, क्योंकि उन्होंने जनजीवन के यथार्थ को सबसे गहराई से चित्रित किया।
मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट ने कहा कि प्रेमचंद को पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों वर्गों में समान रूप से स्वीकार्यता मिली है, क्योंकि उन्होंने आम जनजीवन को साहित्य में स्थान दिया। उन्होंने कल्पना प्रधान साहित्य को यथार्थ के धरातल पर उतारा और सीधी, सरल भाषा में समाज की गूढ़ सच्चाइयों को उद्घाटित किया। उनके पात्र कोई गढ़े हुए काल्पनिक चरित्र नहीं, बल्कि वैचारिक आंदोलनों के जीवंत प्रतीक हैं। मानविकी विद्याशाखा के निदेशक प्रो. गिरिजा प्रसाद पाण्डे ने प्रेमचंद की रचनाओं को भारतीय समाज का वैकल्पिक इतिहास बताया और कहा कि प्रेमचंद के पात्र साहित्यिक कल्पना नहीं, बल्कि समाज के नायक हैं। हिंदी का चयन प्रेमचंद की समन्वयी दृष्टि का प्रमाण है, उन्होंने हिंदी को जनसंचार का सशक्त माध्यम माना। कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो. शिरीष कुमार मौर्य ने प्रेमचंद को साधारणता में महानता का लेखक बताते हुए कहा कि प्रेमचंद पर अतिरेक से परे जाकर उन्हें एक साधारण जन की संवेदना के लेखक के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने साहित्य में एक नई भाषिक तहजीब और सांस्कृतिक समावेशिता को जन्म दिया। ‘गोदान’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़ते समाज की वैचारिक हलचल का चित्र है।

संगोष्ठी में डॉ. अनिल कुमार कार्की ने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य के एकत्व की चर्चा की, वहीं डॉ. पुष्पा बुढलाकोटी ने प्रेमचंद के पात्रों को गांव और शहर के फासले मिटाने वाला बताया। हिंदी विभाग के समन्वयक डॉ. शशांक शुक्ल ने प्रेमचंद की आधुनिक दृष्टि और साहित्य में यथार्थवादी बदलाव की व्याख्या की। संचालन डॉ. कुमार मंगलम और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेन्द्र कैड़ा ने किया। इस अवसर पर शहर के विद्वानजन, विश्वविद्यालय के निदेशकगण, प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से प्रेमचंद की दुर्लभ हस्तलिपि और तस्वीर की प्रदर्शनी भी लगाई गई। साथ ही कुमाऊनी भाषा में प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘कुमगढ़’ का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि, आलोचक और पत्रकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिन्होंने प्रेमचंद की वैचारिक धरोहर को समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनः स्थापित किया।






